करता है उन्मुक्त हास मन, मेरी श्रद्धा ही मेरी आस।। बनकर जीवन एक मृदु पवन, दे जाये मधु आभास।।मेरा आस -पुंज प्रज्वलित, बनकर तम का दृढ़ सहारा।। यह तो प्रेरणा जीवन की, है जीवन का मधुर किनारा।।




समझ


Monday, 06 July 2020 07:32:05
Manju Thapa

क्यों जाऊँ मैं फिर वही पात्र बन

                 उन बिखरे उलझे पन्नों के बीच।
छुपता,दिखता,बिखरता,संवरता
                दिखूं,कभी लूँ आँखें  सबसे मींच।
रुष्

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कैसा बचपन

Monday, 06 July 2020 07:23:58
Manju Thapa

कैसा बचपन,जो तंग गलियों में

सिसकता सा गुज़रता है।
कैसा बचपन,जो कई प्रहर
खाने को तरसता है।
कैसा बचपन,जिस पर
झिड़की का व्यवहार बरसता है
कैसा बचपन,खिलखिलाता नहीं,
आँसू की धार धरता है।
कैसा बचपन, कुछ रुपयों पर
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व्यथा


Saturday, 04 July 2020 09:18:25
Manju Thapa

पिया इस झीने से मौसम में,

जब बूँदों के तार उलझते हैं।
जब शांत मलय समीर सहारे 
धीमे दिन और रैन गुज़रते हैं।
तब भी ये क्लांत निष्ठुर हृदय
क्यों रह जाता है अनमना सा।
इसमें पल पल उद्वेग् की लहरें 
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 नारी


Friday, 26 June 2020 05:04:56
Manju Thapa

बीती हुई कहानी की,

एक विशेष पात्र हो तुम।
उलझी हुई पहेली की,
कोई कड़ी मात्र हो तुम।
इसीलिए तुम्हारे बिना,
प्रज्ञा स्थिर हो जाती है।
जागी हुई भाग्य रेखा,
पल भर में सो जाती है।
फिर भी तुम स्वयं को, 

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 निद्रा


Friday, 26 June 2020 04:55:55
Manju Thapa

संवेदना के गहरे पार ये स्नायु तंत्र बिखर जाता है।

झीने दुःखों के खुले द्वार ये जलकुंड झर जाता है।

इस चेतन मन के स्पंदन में,
           कुछ शून्य सा अनुभव होता है।
और अवकाश तभी मिलता,
  &

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