करता है उन्मुक्त हास मन, मेरी श्रद्धा ही मेरी आस।। बनकर जीवन एक मृदु पवन, दे जाये मधु आभास।।मेरा आस -पुंज प्रज्वलित, बनकर तम का दृढ़ सहारा।। यह तो प्रेरणा जीवन की, है जीवन का मधुर किनारा।।

अभिलाषाएं

अभिलाषाएं कितनी शेष हैं।

व्यथित मन की

कोई पुकारता कहता है

चले दूर है

अनंत

उत्तर सिंधु में डूब हुआ है

नहीं जानता है

प्रश्न पुराना

श्रेष्ठ

आओ थोड़ा खोज ले

रूककर दिशाओं में

मिले समाधान

नहीं

वह कहे मत ढूँढो उसे

अभिलाषा अंतर

निरंतर

अभी दूसरी कई कल्पनाये हैं

शेष,हृदय की।।

 





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डॉ. मंजू थापा

स्वतंत्र रचनाकार,कई पत्र पत्रिकाओं में लेख और कविताएं प्रकाशित। निरंतर रचनात्मक लेखन की राह में समर्पित।। 

ब्लाॅग का उद्देश्य रचनात्मक चिंतन एवं मनोभावों को नई दिशा एवं प्रेरणा मिले,जिससे लेखन प्रभावी और सारगर्भित हो।।