करता है उन्मुक्त हास मन, मेरी श्रद्धा ही मेरी आस।। बनकर जीवन एक मृदु पवन, दे जाये मधु आभास।।मेरा आस -पुंज प्रज्वलित, बनकर तम का दृढ़ सहारा।। यह तो प्रेरणा जीवन की, है जीवन का मधुर किनारा।।

एक प्रश्न

अवकाश हुआ बीते दिनों का,

मिल तो लेते कहीं  से।।

जीकर देखो हमारी ये  यात्रा,
वापस आओगे वहीँ से।।

कैसे दोगे उलाहना फिर हमें,
मन में रखोगे प्रश्न नया।।

हाँ, संकोचवश कह न सकोगे,
इस दुर्दशा पर सही से।।








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डॉ. मंजू थापा

स्वतंत्र रचनाकार,कई पत्र पत्रिकाओं में लेख और कविताएं प्रकाशित। निरंतर रचनात्मक लेखन की राह में समर्पित।। 

ब्लाॅग का उद्देश्य रचनात्मक चिंतन एवं मनोभावों को नई दिशा एवं प्रेरणा मिले,जिससे लेखन प्रभावी और सारगर्भित हो।।