करता है उन्मुक्त हास मन, मेरी श्रद्धा ही मेरी आस।। बनकर जीवन एक मृदु पवन, दे जाये मधु आभास।।मेरा आस -पुंज प्रज्वलित, बनकर तम का दृढ़ सहारा।। यह तो प्रेरणा जीवन की, है जीवन का मधुर किनारा।।

महिला दिवस

कितनी वेदनाएं छुपा लेती है

अपने हृदय में नारी
महिला दिवस मना लेती हैं
संचार माध्यमों से सारी
याद दिलाती गरिमा की
पुरजोर अस्तित्व की पैरवी करती
स्वाधिकार एवं समर्थन की
बातें फिर किसी माह ना दिखती
उन्मुक्त खोखले विचारों व
दकियानूसी धाराओं पर चलती
गिरती पड़ती हालत पर
इनकी नज़र कभी ना झुकती
ये कैसा मान सम्मान
जो वर्ष में एक बार आता
और इनके रग रग में
विश्वास का रंग भर जाता
कभी स्मरण किया हो
अपनी गरिमा व स्वरुप
या पहचानती वो भी
परिस्थितियों के अनुरूप
उन अनछुई धारणा को
पहचान जो दिलाती कभी
फिर सर्वरूप विश्व में 
शक्तिस्वरूपा कहलाती सभी

(प्रकाशित)






About author
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डॉ. मंजू थापा

स्वतंत्र रचनाकार,कई पत्र पत्रिकाओं में लेख और कविताएं प्रकाशित। निरंतर रचनात्मक लेखन की राह में समर्पित।। 

ब्लाॅग का उद्देश्य रचनात्मक चिंतन एवं मनोभावों को नई दिशा एवं प्रेरणा मिले,जिससे लेखन प्रभावी और सारगर्भित हो।।