करता है उन्मुक्त हास मन, मेरी श्रद्धा ही मेरी आस।। बनकर जीवन एक मृदु पवन, दे जाये मधु आभास।।मेरा आस -पुंज प्रज्वलित, बनकर तम का दृढ़ सहारा।। यह तो प्रेरणा जीवन की, है जीवन का मधुर किनारा।।

 प्रयास

मैंने रोका नहीं, 

उन द्रुत चलते क़दमों को,जो भाग जाना चाहते हैं बिना किसी वजह ..
और कभी भी ना लौटने की संज्ञा के साथ ।।

मैंने तोड़ा नहीं,
उन संकुचित वर्जनाओं को,जो किसी मंज़िल तक पहुँच ही नहीं पाती...
बस पुरातन  में जकड़ती  हुई खोखली  सी।।

मैंने छोड़ा नहीं,
काँटों पर लहूलुहान से,धीमी सांस गिनते से आँखों के सपने...
कभी यथार्थ में अपनी उम्मीदों को संजोयेंगे।।

मैंने जोड़ा नहीं,
माया की इच्छा से परे रिश्तो की सुगबुगाहट के संसार को
ये तौलने को आतुर रहते हैं भावनाओं का स्तर।।





About author
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डॉ. मंजू थापा

स्वतंत्र रचनाकार,कई पत्र पत्रिकाओं में लेख और कविताएं प्रकाशित। निरंतर रचनात्मक लेखन की राह में समर्पित।। 

ब्लाॅग का उद्देश्य रचनात्मक चिंतन एवं मनोभावों को नई दिशा एवं प्रेरणा मिले,जिससे लेखन प्रभावी और सारगर्भित हो।।