करता है उन्मुक्त हास मन, मेरी श्रद्धा ही मेरी आस।। बनकर जीवन एक मृदु पवन, दे जाये मधु आभास।।मेरा आस -पुंज प्रज्वलित, बनकर तम का दृढ़ सहारा।। यह तो प्रेरणा जीवन की, है जीवन का मधुर किनारा।।

सपने

सूने होते से अब सपने।।

ना परियों की बातें,ना सपनों के  झूले।
ना खिलखिलाते मन,ना ही डराते तन।
मिलते इनमें ना अपने ।।

नींद के श्यामल गाँव,चलके गहरे पांव।
ये सच ना होंगे,इनकी धीमी सी छाँव ।
कहीं दूर चले पनपने ।।

जिज्ञासा की राह,कभी उम्मीद या आह।
इनका ना हो अंत,ये छुपते दिखते अनंत।
ढूँढ नहीं सकते ठिकाने।।
सूने होते से अब सपने ।।





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डॉ. मंजू थापा

स्वतंत्र रचनाकार,कई पत्र पत्रिकाओं में लेख और कविताएं प्रकाशित। निरंतर रचनात्मक लेखन की राह में समर्पित।। 

ब्लाॅग का उद्देश्य रचनात्मक चिंतन एवं मनोभावों को नई दिशा एवं प्रेरणा मिले,जिससे लेखन प्रभावी और सारगर्भित हो।।