करता है उन्मुक्त हास मन, मेरी श्रद्धा ही मेरी आस।। बनकर जीवन एक मृदु पवन, दे जाये मधु आभास।।मेरा आस -पुंज प्रज्वलित, बनकर तम का दृढ़ सहारा।। यह तो प्रेरणा जीवन की, है जीवन का मधुर किनारा।।

परीक्षाकाल

अशोक के स्थिर युगों के साथ,

ख़त्म हुआ ये परीक्षाकाल।।

निकल चला हूँ मैं यायावर,

अपने पथ की लेकर चाल।।

कुछ उमंग सी भावों में उभरी,

शेष लुप्त हुई स्मृति में।।

कुछ को किया जागृत सपनों में,

कुछ स्थिरता से आयी गति में।।

चलायमान हुआ तन भी मन भी,

अब निकल जाना है कोसो दूर।।

उत्तीर्ण हुआ अपने प्रयत्न से,

परिश्रम करते करते भरपूर।।

यात्रा सुखद और आनंदमय हो,

इच्छा यही हृदय से करता हूँ।।

गाता हूँ राग भविष्य के,

और पथ पर चलता जाता हूँ।।




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