करता है उन्मुक्त हास मन, मेरी श्रद्धा ही मेरी आस।। बनकर जीवन एक मृदु पवन, दे जाये मधु आभास।।मेरा आस -पुंज प्रज्वलित, बनकर तम का दृढ़ सहारा।। यह तो प्रेरणा जीवन की, है जीवन का मधुर किनारा।।

 ये रात

ये रात स्याह  घनी अँधेरी सी।

इसमें चाँदनी की चमक नहीं,
मारुत बहकर नहीं गुनगुनाता,
झीना झीना  क्षण  लहराता।।

ये रात स्याह घनी अँधेरी सी।
इसमें  जुगनु  खिलते  नहीं,
पक्षियों का गान ठिठक जाता,
कलरव भी शांत  रह जाता।।

ये रात स्याह घनी अँधेरी सी।
इसमें दिन की भगदड़ नहीं,
आतुर  समय  ठहर  जाता,
समझने,सुनने में सिमट जाता।।

ये रात स्याह घनी अँधेरी सी।
आँखों में सपने सजते नहीं,
शिथिल तन कहीं लुढ़क जाता,
बस कल्पना  नहीं बुन पाता।।

ये रात स्याह घनी अँधेरी सी।
इसमें उलझने सिमटती नहीं
ढूंढों बहुत पर मिलती नहीं,
धुँधला  राग  बिलख  जाता।।





About author
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डॉ. मंजू थापा

स्वतंत्र रचनाकार,कई पत्र पत्रिकाओं में लेख और कविताएं प्रकाशित। निरंतर रचनात्मक लेखन की राह में समर्पित।। 

ब्लाॅग का उद्देश्य रचनात्मक चिंतन एवं मनोभावों को नई दिशा एवं प्रेरणा मिले,जिससे लेखन प्रभावी और सारगर्भित हो।।