करता है उन्मुक्त हास मन, मेरी श्रद्धा ही मेरी आस।। बनकर जीवन एक मृदु पवन, दे जाये मधु आभास।।मेरा आस -पुंज प्रज्वलित, बनकर तम का दृढ़ सहारा।। यह तो प्रेरणा जीवन की, है जीवन का मधुर किनारा।।

मन दूर चला जाता है

मन दूर चला जाता है।


जब इसे कोई बात कचोटती है।
चुभती रहती है
और दर्द का बोझ वहन नहीं कर पाता
तब,
मन दूर चला जाता है।।

जब अदृश्य घाव इसे छलनी कर देते।
जीने नहीं देते
और  इच्छा पर भी ये मर नहीं पाता
तब,
मन दूर चला जाता है।।

जब लगता है कि सब खत्म हो गया।
सब कुछ खो गया
और बेचैन सा ये कहीं चैन नहीं पाता
तब,
मन दूर चला जाता है।।

जब आत्मसात करे धोख़ा अपने का था।
सोचा,सपने सा था
और विश्वासघात पर विश्वास नहीं पाता 
तब,
मन दूर चला जाता है।।

जब जीने का कोई विकल्प नहीं दिखता।
आँसू सा सिसकता
और  कुछ चाह कर भी कर नहीं पाता
तब,
मन दूर चला जाता है।।






About author
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डॉ. मंजू थापा

स्वतंत्र रचनाकार,कई पत्र पत्रिकाओं में लेख और कविताएं प्रकाशित। निरंतर रचनात्मक लेखन की राह में समर्पित।। 

ब्लाॅग का उद्देश्य रचनात्मक चिंतन एवं मनोभावों को नई दिशा एवं प्रेरणा मिले,जिससे लेखन प्रभावी और सारगर्भित हो।।