करता है उन्मुक्त हास मन, मेरी श्रद्धा ही मेरी आस।। बनकर जीवन एक मृदु पवन, दे जाये मधु आभास।।मेरा आस -पुंज प्रज्वलित, बनकर तम का दृढ़ सहारा।। यह तो प्रेरणा जीवन की, है जीवन का मधुर किनारा।।

सीखती हूँ

सीखती हूँ निरंतर....

हमेशा अनुभवों से नहीं,
वो सुधारते हैं!
कितना?
स्मृति धीमी गति से क्षयपात्र की तरह
विलय होती है।
पर ये जो इच्छाशक्ति है मौन सी
रुकने कहाँ देती?
लोग हमेशा कमजोर आंकते हैं।
उपमा भी देते हैं।
अनेक रूपों में,
कभी डरा सहमा वर्ग,
कभी सशक्त,उदात्त स्तर
और कभी कोमल व ओजपूर्ण भी।
सामान्य परिचय मिलता ही नहीं।
इसके अतिरिक्त या परे ही,
जैसे सिर्फ यही है अस्तित्व....
मनोधारणाओं को तोड़ना मुश्किल है
इसलिए उन्हें वहीं रोक कर
आगे बढ़ती हूँ।
क्योंकि सरलता महत्वाकांक्षा से दूर है।
अनुभव व्यतीत हो गए।
ज्ञान अनेक तारागणों में फैला है
और इच्छा अपरिमित।
इसलिये 
सीखती हूँ निरंतर....






About author
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डॉ. मंजू थापा

स्वतंत्र रचनाकार,कई पत्र पत्रिकाओं में लेख और कविताएं प्रकाशित। निरंतर रचनात्मक लेखन की राह में समर्पित।। 

ब्लाॅग का उद्देश्य रचनात्मक चिंतन एवं मनोभावों को नई दिशा एवं प्रेरणा मिले,जिससे लेखन प्रभावी और सारगर्भित हो।।