करता है उन्मुक्त हास मन, मेरी श्रद्धा ही मेरी आस।। बनकर जीवन एक मृदु पवन, दे जाये मधु आभास।।मेरा आस -पुंज प्रज्वलित, बनकर तम का दृढ़ सहारा।। यह तो प्रेरणा जीवन की, है जीवन का मधुर किनारा।।

मौन

बुद बुद करते होंठो की बात,

समझे कैसे मन अनजान।।
लिपि है टेढ़ी मेढ़ी बहुत
इसकी कहाँ मिलती पहचान।।
इतना भी भिज्ञ नहीं, लगा लूँ 
अनुमान मन की थाह का।।
मुझे क्या इच्छा इसकी कुछ
राही हूँ मैं स्वतंत्र राह का।।
कथा ये जाने अपनी स्वयं की
तभी तो अनमन कुछ कहती है
और समझ सके ना कोई इसको
मन में ही धारा बहती है।।
रुक जाऊँ तो हो जाएंगे चुप,
और सिल जायेंगे होंठ बिन सिले।।
चल दूंगा तो आँसू से गल जाएंगे
 मन के स्वप्न सुनहले।।





About author
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डॉ. मंजू थापा

स्वतंत्र रचनाकार,कई पत्र पत्रिकाओं में लेख और कविताएं प्रकाशित। निरंतर रचनात्मक लेखन की राह में समर्पित।। 

ब्लाॅग का उद्देश्य रचनात्मक चिंतन एवं मनोभावों को नई दिशा एवं प्रेरणा मिले,जिससे लेखन प्रभावी और सारगर्भित हो।।