करता है उन्मुक्त हास मन, मेरी श्रद्धा ही मेरी आस।। बनकर जीवन एक मृदु पवन, दे जाये मधु आभास।।मेरा आस -पुंज प्रज्वलित, बनकर तम का दृढ़ सहारा।। यह तो प्रेरणा जीवन की, है जीवन का मधुर किनारा।।

कपट

समझ सकता है वो कैसे ,

जो कठोर हृदय को जीता है।।

गरल पात्र को सामने रखकर,

स्वयं अमृत को पीता है।।

द्वेष विद्वेष की बातें कहकर,

मन में विष भर चल देता।

जलती चिता की अग्नि सा ये ,

दहकता ,सहता पर ना रोता।।

वही वो बैठ किंचित दूर,

हँस हँस जड़ता रहता चोट।।

कभी आता प्रत्यक्ष होकर,

करता वार छुप किसी ओट।।

ईर्ष्या से भरे उस मन को देखो,

नहीं मिले जब कोई ठौर ठिकाना ,

लौट के वापस आएगा ही,

बनकर फिर से झूठा अपना।।




About author
Generic placeholder image