करता है उन्मुक्त हास मन, मेरी श्रद्धा ही मेरी आस।। बनकर जीवन एक मृदु पवन, दे जाये मधु आभास।।मेरा आस -पुंज प्रज्वलित, बनकर तम का दृढ़ सहारा।। यह तो प्रेरणा जीवन की, है जीवन का मधुर किनारा।।

दिशा

रबर बनकर मिटा देता,

दुःख की पेंसिल का हर वार।
लिखने की कोशिश तो करते,
तब दिखती मुश्किल अपार।
स्याह क़लम से बयां किया,
वो एक एक शब्द सटीक था।
पर लेखनी की आभा ने,
झुठला दिया जो ठीक था।
अब कागज़ पर गुस्सा क्यों?
इसके अस्तित्व को मत तोड़ो।
इतना मत बरसो इस पर,
रहने दो ज़्यादा मत मोड़ो।
रुला देंगी बीती स्मृतियां,
पटरी इसे कहाँ मापेंगी।
बोझ ना रखो इस मन पर,
जीवन सही दिशा नापेगी।
बंद करो पूरा अध्याय,
ज़िल्द सजा लो मुस्कान से।
आने लगी आहट नयी,
सुन लो कोमल कान से।
           

                           (प्रकाशित)






About author
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डॉ. मंजू थापा

स्वतंत्र रचनाकार,कई पत्र पत्रिकाओं में लेख और कविताएं प्रकाशित। निरंतर रचनात्मक लेखन की राह में समर्पित।। 

ब्लाॅग का उद्देश्य रचनात्मक चिंतन एवं मनोभावों को नई दिशा एवं प्रेरणा मिले,जिससे लेखन प्रभावी और सारगर्भित हो।।