करता है उन्मुक्त हास मन, मेरी श्रद्धा ही मेरी आस।। बनकर जीवन एक मृदु पवन, दे जाये मधु आभास।।मेरा आस -पुंज प्रज्वलित, बनकर तम का दृढ़ सहारा।। यह तो प्रेरणा जीवन की, है जीवन का मधुर किनारा।।

प्रकृति

देख रहे जो तुमको दिखती घने वृक्ष की शीतल छाँव।।
बैठ जाते छाया में इसकी थक जाते जब तुम्हारे पाँव।।
पानी पीते लगता मीठा प्यास बुझाते उर अंतर की।।
शांति मिलती ठंडी मिट्टी की गोद में बैठ के पल भर की।।
क्यों जाते फिर भूल, थोड़ा जाकर दूर  इसने तुम्हे अपनाया था।।
सुख दुःख के कोमल ,कठोर पलों में साथ तुम्हारा निभाया था।।
पर तुमने अपने सुख के आगे इस को सदा ठुकराया है।
प्रकृति का विध्वंस करके अपने स्वार्थ को जगाया है।
समय जागने का शुरू हुआ अब  इससे मत मुँह फेरो।।
अपने अथक प्रयास से इसके कण कण को वैभव से भरो।
जितना इसको संभालोगे उतना संग इसके चलोगे परस्पर।।
स्नेह और उदारता से इसको सृजित करो जीवन भर।।
प्रकृति देती पूरा है  पर  हम संभाल  नहीं पाते है।।
और घृणित अपने कार्य से इसका विध्वंश कर गिराते हैं।।
वक़्त अभी भी शेष है कर लें उपाय इसे बचाकर रखने का।।
वरना रह जाएंगे मलते हाथ,भविष्य होगा शेष तरसने का।।














About author
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डॉ. मंजू थापा

स्वतंत्र रचनाकार,कई पत्र पत्रिकाओं में लेख और कविताएं प्रकाशित। निरंतर रचनात्मक लेखन की राह में समर्पित।। 

ब्लाॅग का उद्देश्य रचनात्मक चिंतन एवं मनोभावों को नई दिशा एवं प्रेरणा मिले,जिससे लेखन प्रभावी और सारगर्भित हो।।