करता है उन्मुक्त हास मन, मेरी श्रद्धा ही मेरी आस।। बनकर जीवन एक मृदु पवन, दे जाये मधु आभास।।मेरा आस -पुंज प्रज्वलित, बनकर तम का दृढ़ सहारा।। यह तो प्रेरणा जीवन की, है जीवन का मधुर किनारा।।

विचार

ठोकर जब भी खाता है।

ये मन बहुत कुम्हलाता है।।

                गिनता ढूँढ ढूँढ वो क्षण।
                जिसने बनाया दुःखी हर कण।।

गलती कहाँ थी मैंने की।
और बात क्या थी मन की।।

                आता समझ कुछ नहीं।
                सपने सा लगता सब कुछ ही।।

बतलाये कोई मुझे यहाँ।
कैसे सम्हालु ये सब कहाँ।।

                मिलता ना जब कोई उत्तर।
                आशा डूबती है कहीं दूर पर।।

उदास हो जाता है मन ये।
कैसे अब खुद को समझाए।।

                बस यही वीथिका रहती।
                कथा नयी नहीं कुछ कहती।।

दिन रैन ढलते ऐसे ही।
फिरेंगे दिन ना जाने कब ही।।





About author
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डॉ. मंजू थापा

स्वतंत्र रचनाकार,कई पत्र पत्रिकाओं में लेख और कविताएं प्रकाशित। निरंतर रचनात्मक लेखन की राह में समर्पित।। 

ब्लाॅग का उद्देश्य रचनात्मक चिंतन एवं मनोभावों को नई दिशा एवं प्रेरणा मिले,जिससे लेखन प्रभावी और सारगर्भित हो।।