करता है उन्मुक्त हास मन, मेरी श्रद्धा ही मेरी आस।। बनकर जीवन एक मृदु पवन, दे जाये मधु आभास।।मेरा आस -पुंज प्रज्वलित, बनकर तम का दृढ़ सहारा।। यह तो प्रेरणा जीवन की, है जीवन का मधुर किनारा।।

सावन

घिर आयी फिर से बदरा।।


सावन लेकर आया संग अपने,
झीने झीने मीठे सपने।
इठलाते तन मुस्काते मन
सजने लगा नैनों में कजरा।
घिर आयी फिर से बदरा ।।

बनती जाती बूँदों की श्रृंखला,
वन उपवन में सजी हैं कलियां।
मुस्काती शरमाती झूमती।
गाती धुन बजता है दादरा।
घिर आयी फिर से बदरा ।।





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डॉ. मंजू थापा

स्वतंत्र रचनाकार,कई पत्र पत्रिकाओं में लेख और कविताएं प्रकाशित। निरंतर रचनात्मक लेखन की राह में समर्पित।। 

ब्लाॅग का उद्देश्य रचनात्मक चिंतन एवं मनोभावों को नई दिशा एवं प्रेरणा मिले,जिससे लेखन प्रभावी और सारगर्भित हो।।