करता है उन्मुक्त हास मन, मेरी श्रद्धा ही मेरी आस।। बनकर जीवन एक मृदु पवन, दे जाये मधु आभास।।मेरा आस -पुंज प्रज्वलित, बनकर तम का दृढ़ सहारा।। यह तो प्रेरणा जीवन की, है जीवन का मधुर किनारा।।

वर्षा

वर्षा, तुम बदलती कई रूप।


अच्छा लगता है आगमन तुम्हारा
खिलता जहाँ का आँगन सारा।
मिलता इस तन को बहुत सुकून
जब कड़े धूप से झुलसाती धूप।

बूँदों की रिमझिम में समेटती
कई मन के सकल विकल राग।
पहुंचाती चन्दन लेप सा मलहम
घाव सिहरते दर्द के बड़े कुरूप।

आहत मन की करुण वेदना
सुनकर अतृप्त हो जाती हो तुम।
बरसती हो अतिवृष्टि बनकर
बहा देती जग का पूर्ण स्वरुप।





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डॉ. मंजू थापा

स्वतंत्र रचनाकार,कई पत्र पत्रिकाओं में लेख और कविताएं प्रकाशित। निरंतर रचनात्मक लेखन की राह में समर्पित।। 

ब्लाॅग का उद्देश्य रचनात्मक चिंतन एवं मनोभावों को नई दिशा एवं प्रेरणा मिले,जिससे लेखन प्रभावी और सारगर्भित हो।।