करता है उन्मुक्त हास मन, मेरी श्रद्धा ही मेरी आस।। बनकर जीवन एक मृदु पवन, दे जाये मधु आभास।।मेरा आस -पुंज प्रज्वलित, बनकर तम का दृढ़ सहारा।। यह तो प्रेरणा जीवन की, है जीवन का मधुर किनारा।।

मेरा अस्तित्व

ना धरती,ना अम्बर,ना क्षितिज़ है मेरा।

ना विश्व,ना अपना देश,ना तेरा वो मेरा।।
जन्मदात्री,ना परिवार,कोई लोग ना अपने।
कैसे देखूं नन्ही उलझन इन आँखों से सपने।।

न समय,ना दिन ना प्रहर है मेरा।
ना प्रकृति, ना ऋतु ,ना मौसम है मेरा।।
दूर चली हूँ प्रबल वेग से होकर आहत मैं।
उपालम्भ के तीक्ष्ण वारो से बचने की चाहत में।।

ना समाज,ना समुदाय,ना कोई लोग मेरे।
ना निधियां,ना कोई रत्न,ना कंकड़ सुनहरे।।
बिछे अंगारों पर  सबने प्रज्वलित मुझे किया।
कठोर  दुर्बल हृदयों के भाव ने विचलित किया।।

ना संवेग, ना विचार ,ना स्थान अनूप मेरा।
ना आशा ,ना निराशा ,ना कोई स्वरुप मेरा।
मैं होऊं जो शक्ति स्वरुप अस्तित्व को पा लुंगी।
जी लूंगी जीवन अविराम,स्वयं में जग छुपा लूंगी।

(प्रकाशित)






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डॉ. मंजू थापा

स्वतंत्र रचनाकार,कई पत्र पत्रिकाओं में लेख और कविताएं प्रकाशित। निरंतर रचनात्मक लेखन की राह में समर्पित।। 

ब्लाॅग का उद्देश्य रचनात्मक चिंतन एवं मनोभावों को नई दिशा एवं प्रेरणा मिले,जिससे लेखन प्रभावी और सारगर्भित हो।।