करता है उन्मुक्त हास मन, मेरी श्रद्धा ही मेरी आस।। बनकर जीवन एक मृदु पवन, दे जाये मधु आभास।।मेरा आस -पुंज प्रज्वलित, बनकर तम का दृढ़ सहारा।। यह तो प्रेरणा जीवन की, है जीवन का मधुर किनारा।।

तिनका

तिनके....

तुम्हे चुरा लायी गौरैय्या।
किसी की नज़र बचाकर नहीं।
तुम्हे स्वयं से।
तुम यूँ ही अलग थलग पड़े थे...
धूल भरी राह में,
किसी के गन्दगी से सने जूते,चप्पलों से कुचले हुए.....
आहत से दयनीय अवस्था में,
घायल इतने की क्षीण थी जीवन ऊर्जा।
वाह्यतं नहीं....
अंतर्मन से
तुम्हे कोई आशा नहीं थी...
जीवन की।
शून्य तक निहार कर भी कोई सहायता की।
कितना क्षोभ फ़ैल गया था तुम्हारे तन मन में?क्रोध से उठी अग्नि तुम्हे जला कर भस्म नहीं कर पा रही थी।
आँखिर किसी को नहीं थी तुम्हरे प्रति संवेदना।इतनी करुणा कि ...
उठा लेतेकिसी के कोमल हाथ तुम्हे 
और अपनी रुई सी उँगलियों से सहला देते।
क्या पता अपने रेशमी गालों को स्पर्श कराते
और तुम जीवंन्त हो उठते।
उस मर्मस्पर्शी स्नेह की ऊर्जा तुम्हारे प्राणों को वापस खींचने का प्रयास करती।
पर ये स्वप्न सरीखा सा था ।
तुम बस कराहते रह गए,
बेबस से...
इसी समय तुम्हे सहारा दिया।
एक नन्ही सी जीव ने
और उठा लायी अपने मुँह में दबा कर।
अपने नन्हे संसार की नींव को मज़बूत करने।
तुम्हे सम्हालने,
और सजाने के लिए
तुम्हे घर में बसाने के लिए,
जहाँ तुम सारी खुशियां देख सको
और जी सको।
हँसी और चुलबुले से पलों को।
ममता और स्नेह के बंधन को।
त्याग और बिछोह के संबंध को।
शायद कभी आज के जैसे कराह भी जाओ
पर उसमे सुकून होगा।
जीवन भर का....














About author
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डॉ. मंजू थापा

स्वतंत्र रचनाकार,कई पत्र पत्रिकाओं में लेख और कविताएं प्रकाशित। निरंतर रचनात्मक लेखन की राह में समर्पित।। 

ब्लाॅग का उद्देश्य रचनात्मक चिंतन एवं मनोभावों को नई दिशा एवं प्रेरणा मिले,जिससे लेखन प्रभावी और सारगर्भित हो।।