करता है उन्मुक्त हास मन, मेरी श्रद्धा ही मेरी आस।। बनकर जीवन एक मृदु पवन, दे जाये मधु आभास।।मेरा आस -पुंज प्रज्वलित, बनकर तम का दृढ़ सहारा।। यह तो प्रेरणा जीवन की, है जीवन का मधुर किनारा।।

परीक्षाकाल

शोक  के स्थिर युगों  सा

ख़त्म हुआ परीक्षा काल।
निकल चल पड़ा हूँ राही 
लेकर अपने पथ की चाल।।

कुछ किस्से  अपनेपन के
कुछ अनजान एकाकी थे।
कुछ उलझे स्वप्नदर्शी बने
कुछ उन्मुक्त उड़ते पाखी थे।।

कुछ ईर्ष्या से मदमस्त थे
कुछ मनमौजी से चरित्र।
कुछ गंभीर रूद्र से चेहरे
कुछ सुंदरता के थे चित्र।।

कुछ हलके हवा से साथी
उड़ते संग और उड़ा जाते।
कुछ हँसी बिखेर होंठों में
मीठी मुस्कान खिला जाते।।

इन्ही सभी को लेकर साथ
कहकर इनसे मन की बात।
दूर निकल आया  राही मैं
लेकर जीवन भर का साथ।।





About author
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डॉ. मंजू थापा

स्वतंत्र रचनाकार,कई पत्र पत्रिकाओं में लेख और कविताएं प्रकाशित। निरंतर रचनात्मक लेखन की राह में समर्पित।। 

ब्लाॅग का उद्देश्य रचनात्मक चिंतन एवं मनोभावों को नई दिशा एवं प्रेरणा मिले,जिससे लेखन प्रभावी और सारगर्भित हो।।