करता है उन्मुक्त हास मन, मेरी श्रद्धा ही मेरी आस।। बनकर जीवन एक मृदु पवन, दे जाये मधु आभास।।मेरा आस -पुंज प्रज्वलित, बनकर तम का दृढ़ सहारा।। यह तो प्रेरणा जीवन की, है जीवन का मधुर किनारा।।

              आँसू

मत करो प्रवाहित इन्हें सुदूर,

                     ये आँसू लो पलकों में मींच।
कोई नहीं करुणा करता इनसे,
                     स्वयं ही रखो इनको सींच।
कितनी उलाहना का जतन करो,
                      ये बरस कर भी पछतायेंगे।
समझेगा ना कोई भाव सकल,
                      ये उर के अंतर को गलायेंगे।
जो कह भी दोगे मन की व्यथा,
                       काँपते होंठों से मुँह को भींच।
हल्की दुःख की आभा संयुक्त,
                       माथे पर लेंगे चिंता-रेखा खींच।
इनका उपकार बस इतना ही,
                      इनको स्वयं के रखो मन में।
ग्लानि न क्षोभ का भाव हो,
                      साथ उतरते चलो जीवन में।





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डॉ. मंजू थापा

स्वतंत्र रचनाकार,कई पत्र पत्रिकाओं में लेख और कविताएं प्रकाशित। निरंतर रचनात्मक लेखन की राह में समर्पित।। 

ब्लाॅग का उद्देश्य रचनात्मक चिंतन एवं मनोभावों को नई दिशा एवं प्रेरणा मिले,जिससे लेखन प्रभावी और सारगर्भित हो।।