करता है उन्मुक्त हास मन, मेरी श्रद्धा ही मेरी आस।। बनकर जीवन एक मृदु पवन, दे जाये मधु आभास।।मेरा आस -पुंज प्रज्वलित, बनकर तम का दृढ़ सहारा।। यह तो प्रेरणा जीवन की, है जीवन का मधुर किनारा।।

निद्रा-संसार

संवेदना के गहरे पार,

              ये स्नायु तंत्र बिखर जाता है।
झीने दुःखों के खुले द्वार
              और जल कुंड झर जाता है।
इस चेतन मन के स्पंदन में,
              कुछ शून्य अनुभव होता है।
और अवकाश तभी मिलता, 
              जब तन चुपचाप हो सोता है।
निद्रा सपनों का संसार नहीं,
              ये शांत सी एक प्रतीक्षा है।
सुख में प्रसन्नता की साथी,
              चिंता में दर्शन की दीक्षा है।
मुँह मोड़ नहीं सकते तुम,
              इस असीम सुन्दर बंधन से।
और कभी न मुक्त हो सकते,
              इसके प्रेमपूर्ण आलिंगन से ।











About author
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डॉ. मंजू थापा

स्वतंत्र रचनाकार,कई पत्र पत्रिकाओं में लेख और कविताएं प्रकाशित। निरंतर रचनात्मक लेखन की राह में समर्पित।। 

ब्लाॅग का उद्देश्य रचनात्मक चिंतन एवं मनोभावों को नई दिशा एवं प्रेरणा मिले,जिससे लेखन प्रभावी और सारगर्भित हो।।