करता है उन्मुक्त हास मन, मेरी श्रद्धा ही मेरी आस।। बनकर जीवन एक मृदु पवन, दे जाये मधु आभास।।मेरा आस -पुंज प्रज्वलित, बनकर तम का दृढ़ सहारा।। यह तो प्रेरणा जीवन की, है जीवन का मधुर किनारा।।

शुरुआत

करती हूँ मैं फिर से,

हार के बाद नयी शुरुआत।
इस दुःख का करके अंत,
चलती हूँ दिन और रात।।

क्या हुआ जो अंकित हुआ,
नाम मेरा भी कहीं नहीं।
प्रयास छोड़ दूँ कैसे मैं,
आये विपदा भले कैसी कहीं।
काली रात का विराम
होते ख़त्म,अब हुआ प्रभात।
करती हूँ मैं फिर से
हार के बाद नयी शुरुआत।।

भीग गयी जो पलकें काली,
ख़ुशी से नम होंगी कभी।
ऋतु भर प्रतीक्षा तो कर लूँ,
अपने पराये साथ होंगे सभी।
मुस्कुराने का समय आया,
समर्थ होने लगा ये गात।
करती हूँ मैं फिर से,
हार के बाद नयी शुरुआत।।

प्रयास अविरल रहेगा अब,
तन मन ना ये थक पायेगा।
पाने को अपना पूर्ण लक्ष्य,
ना जागेगा, ना सो पायेगा।
बस चलते रहना है निरंतर,
अपने से करके अपनी बात।
करती हूँ मैं फिर से,
हार के बाद नयी शुरुआत।।













About author
Generic placeholder image
डॉ. मंजू थापा

स्वतंत्र रचनाकार,कई पत्र पत्रिकाओं में लेख और कविताएं प्रकाशित। निरंतर रचनात्मक लेखन की राह में समर्पित।। 

ब्लाॅग का उद्देश्य रचनात्मक चिंतन एवं मनोभावों को नई दिशा एवं प्रेरणा मिले,जिससे लेखन प्रभावी और सारगर्भित हो।।