करता है उन्मुक्त हास मन, मेरी श्रद्धा ही मेरी आस।। बनकर जीवन एक मृदु पवन, दे जाये मधु आभास।।मेरा आस -पुंज प्रज्वलित, बनकर तम का दृढ़ सहारा।। यह तो प्रेरणा जीवन की, है जीवन का मधुर किनारा।।

प्रेरणा

विवश नहीं बस हारा हूँ, 
रुक जाऊँगा थोड़ी देर।।
निमग्न अंधकार के वश,
उगता सूरज पर सवेर।।
भूल ना जाना मेरे मन तू, 
पाकर इस तन की पीर।। 
चलना दो गुना बढ़कर है,
उस मंज़िल पर,धरकर धीर।।





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डॉ. मंजू थापा

स्वतंत्र रचनाकार,कई पत्र पत्रिकाओं में लेख और कविताएं प्रकाशित। निरंतर रचनात्मक लेखन की राह में समर्पित।। 

ब्लाॅग का उद्देश्य रचनात्मक चिंतन एवं मनोभावों को नई दिशा एवं प्रेरणा मिले,जिससे लेखन प्रभावी और सारगर्भित हो।।