करता है उन्मुक्त हास मन, मेरी श्रद्धा ही मेरी आस।। बनकर जीवन एक मृदु पवन, दे जाये मधु आभास।।मेरा आस -पुंज प्रज्वलित, बनकर तम का दृढ़ सहारा।। यह तो प्रेरणा जीवन की, है जीवन का मधुर किनारा।।

श्रमिक

वे सुन रहे थे अपने हलके पद्चिन्हों की आहट।

ज्यों थक कर डूब रहा भानु दूर नदी के तट।
व्यग्र हाथों से पोंछ रहे  थे वे स्वेद  की  बूँदें।
करते क्या,बैठे रहे बस पलकों को मूँदें ।

निर्लज़्ज़ समय मुँह फेर कर चला गया अब दूर।
घर की और बढ़े कदम,आँखें हैं थक कर चूर।
कठिन परिश्रम करे पराजित,डिगता मन पल पल
कब मिलेगी मुक्ति,कब होगा  हमारा बेहतर कल।

पूँजी मुट्ठी भर ही मिलती,खुलते ही खो जाती।
छिन जाता उत्साहित मन,नयी राहें भी खो जाती।
नई भोर की आस में तन मशीन सा चलता जाता।
कितनी भी कठिनाई  हो ये मन बेमन गाता जाता।

कितना चलें दूर तक मंज़िल की कोई राह नहीं।
असह्य जीवन बोझ को दूर तक ढोने की चाह नहीं
अविरल संघर्ष से टूट गया सपना बेहतर कल का।
बिखर गया विश्वास सक्षम समय के पल पल का।

हो अब दुर्दिन का अंत जीवन में छाए उजियारा।
खोये दुर्भाग्य के पृष्ठों में मुस्काये जीवन प्यारा।
धुल पूरित कंटक पथों से अब हमको मुक्ति मिले।
सरल हमारा जीवन हो जीने की कोई युक्ति मिले।

(प्रकाशित)





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डॉ. मंजू थापा

स्वतंत्र रचनाकार,कई पत्र पत्रिकाओं में लेख और कविताएं प्रकाशित। निरंतर रचनात्मक लेखन की राह में समर्पित।। 

ब्लाॅग का उद्देश्य रचनात्मक चिंतन एवं मनोभावों को नई दिशा एवं प्रेरणा मिले,जिससे लेखन प्रभावी और सारगर्भित हो।।