करता है उन्मुक्त हास मन, मेरी श्रद्धा ही मेरी आस।। बनकर जीवन एक मृदु पवन, दे जाये मधु आभास।।मेरा आस -पुंज प्रज्वलित, बनकर तम का दृढ़ सहारा।। यह तो प्रेरणा जीवन की, है जीवन का मधुर किनारा।।


ज़िन्दगी तेरे इतने रूप क्यों हैं।

कभी छाँव तो,तू कभी धूप क्यों है।।

तू प्यार का बरसता सावन
कभी मेघो की गर्जना क्यों है
कभी भीषण गर्मी से क्लांत
इस मन की वर्जना क्यों है।।

इठलाते प्रेम की प्रिय वाणी
संचरित करती मधु स्वर क्यों है
आहत,हठी हारे हुए तप के
निर्मम विषाद का ज़्वर क्यों है।।

फिरते रहते दल दल में लोग
विश्वास पर लिए आघात क्यों है
आज जिसे स्वीकार किया था
कल उस पर प्रतिवाद है क्यों है।।

ये कैसे कैसे रूप दिखाये
व्याकुल ये अंतरमन क्यों है
अभी का विश्वास फिर टूटा
तुझमे इतना विचलन क्यों है।।

(प्रकाशित)








About author
Generic placeholder image
डॉ. मंजू थापा

स्वतंत्र रचनाकार,कई पत्र पत्रिकाओं में लेख और कविताएं प्रकाशित। निरंतर रचनात्मक लेखन की राह में समर्पित।। 

ब्लाॅग का उद्देश्य रचनात्मक चिंतन एवं मनोभावों को नई दिशा एवं प्रेरणा मिले,जिससे लेखन प्रभावी और सारगर्भित हो।।