करता है उन्मुक्त हास मन, मेरी श्रद्धा ही मेरी आस।। बनकर जीवन एक मृदु पवन, दे जाये मधु आभास।।मेरा आस -पुंज प्रज्वलित, बनकर तम का दृढ़ सहारा।। यह तो प्रेरणा जीवन की, है जीवन का मधुर किनारा।।

  व्यंग्य

तिनके तिनके सी मेरी बात,

                     बिखराते जो आस  पास।।
कितने उनके पल निखरे,
                     कितनों ने बनाया उपहास।।
भीगी बूँदों ने आँखें धोयी,
                     सपनो के बिखर गए तारे।।
सांत्वना के झूठे पन्नों पर,
                     पलट  के  चलाई  कटारें।।
वार करके  प्रेम  सहित,
                     बार बार सामने है आते।।
झूठ बोलकर गठरी भर,
                      स्वयं को ही  झुठलाते।।
मिलते लोग जग में ही,
                      आस पास  ढूंढों  जहाँ।।
बच नहीं सकते इनसे,
                      छुपोगे आँखिर कहाँ कहाँ।।
मन में मैल जमा कर,
                       सामने सफ़ेद बन जाते।।
चेहरे पर आवरण छुपा,
                       कैसा जीवन है अपनाते।।





About author
Generic placeholder image
डॉ. मंजू थापा

स्वतंत्र रचनाकार,कई पत्र पत्रिकाओं में लेख और कविताएं प्रकाशित। निरंतर रचनात्मक लेखन की राह में समर्पित।। 

ब्लाॅग का उद्देश्य रचनात्मक चिंतन एवं मनोभावों को नई दिशा एवं प्रेरणा मिले,जिससे लेखन प्रभावी और सारगर्भित हो।।