करता है उन्मुक्त हास मन, मेरी श्रद्धा ही मेरी आस।। बनकर जीवन एक मृदु पवन, दे जाये मधु आभास।।मेरा आस -पुंज प्रज्वलित, बनकर तम का दृढ़ सहारा।। यह तो प्रेरणा जीवन की, है जीवन का मधुर किनारा।।

होंसला

जब राह चले थे पाने लक्ष्य,

तब पता था मुश्किल होंगे हालात।।
छोटे बड़े हर एक कदम पर ,
बनती  बिगड़ती चलती  थी बात।।
सोचा ना था भाग्य के साथ,
कुछ खेल परिश्रम भी करवायेगा।।
ये समर क्षेत्र है यहां कैसे,
क्या कुछ यूँ  ही छूटा रह जाएगा।।
खुश तो हैं कि बन गयी बात,
जिसके लिए किये थे पूर्ण जतन।।
 पत्थर पर घीसा तन अपना,
और बाधाओं को हरा जीता मन।।
अब भी  बाकी हैं कई मकां,
बस अनवरत चलते रहने की चाह।।
कड़ी यही निरत साधना की,
किसी पूर्ण उद्देश्य को पाने की राह।।





About author
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डॉ. मंजू थापा

स्वतंत्र रचनाकार,कई पत्र पत्रिकाओं में लेख और कविताएं प्रकाशित। निरंतर रचनात्मक लेखन की राह में समर्पित।। 

ब्लाॅग का उद्देश्य रचनात्मक चिंतन एवं मनोभावों को नई दिशा एवं प्रेरणा मिले,जिससे लेखन प्रभावी और सारगर्भित हो।।