करता है उन्मुक्त हास मन, मेरी श्रद्धा ही मेरी आस।। बनकर जीवन एक मृदु पवन, दे जाये मधु आभास।।मेरा आस -पुंज प्रज्वलित, बनकर तम का दृढ़ सहारा।। यह तो प्रेरणा जीवन की, है जीवन का मधुर किनारा।।

अश्रु-गीत

लेकिन मैं रुक न  सका

इन भीगी पलकों के बीच
टूटकर भी गिर ना सका
स्याह-पीले कपोलों को सींच।।

                     मद्धम हुई दीप्त ज्योति
                     हृदय शुष्क ना रह पाया
                     आज छोड़ चला वीराना
                     कल जिसने था अपनाया।।

बोझ ढोता रहा मन का
कभी तन और जीवन का
हँसते-गाते,जागते-सोते
अनुभव करता रीतेपन का।।

                       अधीर हुई अब व्याकुलता
                       किसने सिखा दिया ये बैर
                       बंधन कलुषित होने लगे
                       समय ने मुँह लिया है फ़ेर।।

छुप जाऊँ कहीं जाकर दूर
यह जलकुण्ड की घाटी मेरी
हुई,फिर ना आऊंगा वापस
राहें तुझको अर्पण तेरी।।

                       निलय नहीं बन पाया मेरा
                       विद्रोही मन का कोना कोना
                       अब आँखों से लो ढुलक गया
                       होगा आगे अब कोई दुःख ना।।






About author
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डॉ. मंजू थापा

स्वतंत्र रचनाकार,कई पत्र पत्रिकाओं में लेख और कविताएं प्रकाशित। निरंतर रचनात्मक लेखन की राह में समर्पित।। 

ब्लाॅग का उद्देश्य रचनात्मक चिंतन एवं मनोभावों को नई दिशा एवं प्रेरणा मिले,जिससे लेखन प्रभावी और सारगर्भित हो।।