करता है उन्मुक्त हास मन, मेरी श्रद्धा ही मेरी आस।। बनकर जीवन एक मृदु पवन, दे जाये मधु आभास।।मेरा आस -पुंज प्रज्वलित, बनकर तम का दृढ़ सहारा।। यह तो प्रेरणा जीवन की, है जीवन का मधुर किनारा।।

बेटी

एक छोटी सी आस में, 

ढूँढ  लायी  हूँ  दीर्घ  विश्वास।
ममता हूँ,क्षमता हूँ,
चलती मुझसे जीवन की सांस।
मैं  बेटी  हूँ  पढ़ी लिखी
,विश्व  का  हूँ  मैं  आधार।
आज से नए युग का 
करने जा  रही साक्षात्कार ।
सम्हाल के पंखों को अपने,
मैंने आकाश संजोया है।
टुकड़ों टुकड़ों में सपनों को,
गीली घूप में भिगोया है।
रोक ना ले राह मेरी
कलुषता मनुजता की घृणित।
परिश्रम से आगे बढ़कर, 
लक्ष्य  पाना  है  त्वरित।
योद्धा हूँ जीवन के हर,
सुख दुःख के अभियान की।
सुन्दर कोमल बेटी हूँ,
गरिमा देश के पहचान की।





About author
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डॉ. मंजू थापा

स्वतंत्र रचनाकार,कई पत्र पत्रिकाओं में लेख और कविताएं प्रकाशित। निरंतर रचनात्मक लेखन की राह में समर्पित।। 

ब्लाॅग का उद्देश्य रचनात्मक चिंतन एवं मनोभावों को नई दिशा एवं प्रेरणा मिले,जिससे लेखन प्रभावी और सारगर्भित हो।।