करता है उन्मुक्त हास मन, मेरी श्रद्धा ही मेरी आस।। बनकर जीवन एक मृदु पवन, दे जाये मधु आभास।।मेरा आस -पुंज प्रज्वलित, बनकर तम का दृढ़ सहारा।। यह तो प्रेरणा जीवन की, है जीवन का मधुर किनारा।।

 संकल्प

 नहीं जिऊँगा बन बिहाग ।।


इस द्वंद्व के कण कण को,
समेट लिया अपने मन को।
दुःख की घोर पीड़ा में,
कलुषित नहीं होने  दूंगा।
अपने जीवन का राग।
नहीं जिऊँगा बन बिहाग ।।

ऊर्जा को मेरी छीना है,
उस स्नेह के झूठे धागे ने।
नतमस्तक हो, हार गया,
उसके धोख़े के आगे मैं।
हुआ है मुझे अब विराग।
नहीं जिऊँगा बन बिहाग।।

नहीं बन सकता अब भीरु,
धैर्य के आगे झुक जाऊंगा।
अतीत के बिखरे पन्नों को,
फिर से मैं सहलाऊंगा।
सपने से गया हूँ जाग।
नहीं जिऊँगा बन बिहाग।।





About author
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डॉ. मंजू थापा

स्वतंत्र रचनाकार,कई पत्र पत्रिकाओं में लेख और कविताएं प्रकाशित। निरंतर रचनात्मक लेखन की राह में समर्पित।। 

ब्लाॅग का उद्देश्य रचनात्मक चिंतन एवं मनोभावों को नई दिशा एवं प्रेरणा मिले,जिससे लेखन प्रभावी और सारगर्भित हो।।