करता है उन्मुक्त हास मन, मेरी श्रद्धा ही मेरी आस।। बनकर जीवन एक मृदु पवन, दे जाये मधु आभास।।मेरा आस -पुंज प्रज्वलित, बनकर तम का दृढ़ सहारा।। यह तो प्रेरणा जीवन की, है जीवन का मधुर किनारा।।

समझ

क्यों जाऊँ मैं फिर वही पात्र बन

                 उन बिखरे उलझे पन्नों के बीच।
छुपता,दिखता,बिखरता,संवरता
                दिखूं,कभी लूँ आँखें  सबसे मींच।
रुष्ट हुए जो लोग मुझसे जब
                बंद कर लेंगे सदा का किताबों में।
आना चाहकर भी आ ना सकूँगा
                उनकी हकीकत में या ख़्वाबों में ।





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डॉ. मंजू थापा

स्वतंत्र रचनाकार,कई पत्र पत्रिकाओं में लेख और कविताएं प्रकाशित। निरंतर रचनात्मक लेखन की राह में समर्पित।। 

ब्लाॅग का उद्देश्य रचनात्मक चिंतन एवं मनोभावों को नई दिशा एवं प्रेरणा मिले,जिससे लेखन प्रभावी और सारगर्भित हो।।