करता है उन्मुक्त हास मन, मेरी श्रद्धा ही मेरी आस।। बनकर जीवन एक मृदु पवन, दे जाये मधु आभास।।मेरा आस -पुंज प्रज्वलित, बनकर तम का दृढ़ सहारा।। यह तो प्रेरणा जीवन की, है जीवन का मधुर किनारा।।

कही नहीं जाती हर बात।।

कही नहीं जाती हर बात।।

चाँदनी कहती नहीं कि देख लो मेरी रोशनी।।

सरगम कहती नहीं गुनगुनाओ मेरी रागिनी।।।

शब्द जो बंधते हमेशा नए रूप रंग में, वो कभी कहते नहीं कि ढूंढ लो हर वर्तनी।।

आग में वो ताप है कि जला से सम्पूर्ण जहाँ, तब भी कहता कहाँ की मुझसा कोई और कहाँ।।।

जी लिया,जिसने भी जल को जिस रूप चाहे पिया, फिर भी उसको नहीं गर्व चाहे जड़ चेतन रहा।।।

क्षितिज़ को क्या परवाह की धरा गगन का साथ हो, फिर भी उनको जोड़ता है वो अपने साथ यहीं।।।

इस ज़हाँ की सारी खुशबू उड़ा दे हवा की रार, पर उसको फुर्सत कहाँ है,जो जहां है वही सही।।।

क्रोध होता यदि तुंग पर्वतों के नरेश को, नष्ट कर देते इस धरा के समस्त अभिलेख को।।




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