करता है उन्मुक्त हास मन, मेरी श्रद्धा ही मेरी आस।। बनकर जीवन एक मृदु पवन, दे जाये मधु आभास।।मेरा आस -पुंज प्रज्वलित, बनकर तम का दृढ़ सहारा।। यह तो प्रेरणा जीवन की, है जीवन का मधुर किनारा।।

सोच

वज़ह बहुत हैं खुश होने की।

पर मन फिर भी दुःखता है....
क्यों आँखिर?
नहीं पता...
नहीं सोचता...
इतनी ढेर सारी विचारधाराओं में बहता रहता है।रुकता नहीं।
इसको नहीं है रुक कर सोचने का समय।
सामर्थ्य भी नहीं....
क्योंकि फिर बहुत से प्रश्नों में घिर जायेगा।।उलझनों में बिखर जायेगा
और सामने जो ख़ुशी का क्षण है
उसको फेर देगा।
अतः वापस लौट आता है
उसी यथार्थ में
और बैठ जाता हैं अनमन सा।।
इसी उधेड़ बुन में ख़ो देता है।
ख़ुशी का पल।
हो जाता है दुःखी।।






About author
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डॉ. मंजू थापा

स्वतंत्र रचनाकार,कई पत्र पत्रिकाओं में लेख और कविताएं प्रकाशित। निरंतर रचनात्मक लेखन की राह में समर्पित।। 

ब्लाॅग का उद्देश्य रचनात्मक चिंतन एवं मनोभावों को नई दिशा एवं प्रेरणा मिले,जिससे लेखन प्रभावी और सारगर्भित हो।।