करता है उन्मुक्त हास मन, मेरी श्रद्धा ही मेरी आस।। बनकर जीवन एक मृदु पवन, दे जाये मधु आभास।।मेरा आस -पुंज प्रज्वलित, बनकर तम का दृढ़ सहारा।। यह तो प्रेरणा जीवन की, है जीवन का मधुर किनारा।।

कुछ

जब कुछ भी नहीं आता समझ कि करना क्या है जीवन में,

तब भी हम कुछ कर ही रहे होते हैं।।
जब चलते रहते हैं भीड़ के साथ एकसार होकर अपनी राह,
तब भी पहचान ख़ोज रहे होते है।।
जब उदास से चेहरे पर कई रेखाएँ ओढ़ लेते हैं चिंता की,
तब भी कुछ उसका हल ढूंढ रहे होते हैं।।
जब मुस्कुराते हैं खुलकर और हँसी से आँखें चमकती हैं,
तब भी कोई ख़ुशी बाँच रहे होते हैं ।।
जब भीगती सी यादों को उड़ेल कर सामने बैठ के रोते हैं
तब भी कोई स्मृति संजो रहे होते हैं।।
जब स्याह रात में जागने से लगने लगता है मन को भारी डर,
तब बन्द पलकों में सपने संजो रहे होते हैं।।
जब उदास सी शाम घेरती है इस तन मन को चारों और से,
तब भी उलझन को सुलझा रहे होते हैं।।





About author
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डॉ. मंजू थापा

स्वतंत्र रचनाकार,कई पत्र पत्रिकाओं में लेख और कविताएं प्रकाशित। निरंतर रचनात्मक लेखन की राह में समर्पित।। 

ब्लाॅग का उद्देश्य रचनात्मक चिंतन एवं मनोभावों को नई दिशा एवं प्रेरणा मिले,जिससे लेखन प्रभावी और सारगर्भित हो।।