करता है उन्मुक्त हास मन, मेरी श्रद्धा ही मेरी आस।। बनकर जीवन एक मृदु पवन, दे जाये मधु आभास।।मेरा आस -पुंज प्रज्वलित, बनकर तम का दृढ़ सहारा।। यह तो प्रेरणा जीवन की, है जीवन का मधुर किनारा।।

चिंता

हुआ आज असहाय फिर।


कण कण में अहंकार भरा
टूट गया वो एक क्षण में।
उद्वेलित किया जिसने था
मिटा दिया एक प्रण में।
मिला नहीं कोई उपाय फिर।

राख हुई नैनों की ज्योति
दीप्त प्रतिबिंबित छाया से।
देकर सहारा अनुकंपा से
उसने देखा यूँ माया से।
हार मानी तो जाए फिर

अहम् के धागे टूटे फिर
प्रसन्न हुई अभिलाषा है।
समर्पण की गाई गाथा
फिर जीने की आशा है।
इस दिन को बुलाये फिर।







About author
Generic placeholder image
डॉ. मंजू थापा

स्वतंत्र रचनाकार,कई पत्र पत्रिकाओं में लेख और कविताएं प्रकाशित। निरंतर रचनात्मक लेखन की राह में समर्पित।। 

ब्लाॅग का उद्देश्य रचनात्मक चिंतन एवं मनोभावों को नई दिशा एवं प्रेरणा मिले,जिससे लेखन प्रभावी और सारगर्भित हो।।