करता है उन्मुक्त हास मन, मेरी श्रद्धा ही मेरी आस।। बनकर जीवन एक मृदु पवन, दे जाये मधु आभास।।मेरा आस -पुंज प्रज्वलित, बनकर तम का दृढ़ सहारा।। यह तो प्रेरणा जीवन की, है जीवन का मधुर किनारा।।

ख़ुशी

उठी है आज फिर से मन में जीने की ललक,

मेरे द्वार ये कौन मलय सी पाती लाया है।।

मिल रही है सबसे जुड़ने की मधुर सौगाते,
इस पल को संजोकर किसने दिखलाया है।।

खुशियों की ढेर सी उम्मीदों से सजा है दिन,
ये किसने कानों में रसभरा गीत सुनाया हैं।।

इंद्रधनुष के रंग बिखरने लगे  पूर्ण धरा पर,
ये किसने  तितलियों से  रंग चुराया  है।।

आज सब  मेरे हाथों की मुट्ठी में छुप गया,
ये किसने अपने आँचल में मुझे छुपाया है।।





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डॉ. मंजू थापा

स्वतंत्र रचनाकार,कई पत्र पत्रिकाओं में लेख और कविताएं प्रकाशित। निरंतर रचनात्मक लेखन की राह में समर्पित।। 

ब्लाॅग का उद्देश्य रचनात्मक चिंतन एवं मनोभावों को नई दिशा एवं प्रेरणा मिले,जिससे लेखन प्रभावी और सारगर्भित हो।।