करता है उन्मुक्त हास मन, मेरी श्रद्धा ही मेरी आस।। बनकर जीवन एक मृदु पवन, दे जाये मधु आभास।।मेरा आस -पुंज प्रज्वलित, बनकर तम का दृढ़ सहारा।। यह तो प्रेरणा जीवन की, है जीवन का मधुर किनारा।।

प्रलय

जब प्रलय आता है,
तो सब बहाकर ले जाता है।।
विध्वंश का प्रतिरूप,
अशेष....
कितने तुंग पर्वत,गहर नदियां, अनंत गहरे सागर और आकाश को कंपित अनुभव कराता क्षितिज़....
ये सब सहम जाते है।..
और ये इनकी परवाह किये बिना निस्तेज से उनके अहम् के चक्र का चक्रव्यूह भेद देता है।लौटता है....
पर अपने से कमज़ोर अरियों को एक वार में ध्वस्त कर।।
उसके बाद कोई प्रतिक्रिया नहीं....
 शांत....
दूर दूर तक उसके दमन का प्रत्यक्ष दिखता है।
कोई आँसूं तो क्या पलकों के कोने भी नही भिगोता।
सत्य आभासित नहीं होता।
स्वीकार्य होता है।
और विवेकी इसको त्वरित साध लेते हैं।
यही साधना नया मार्ग खोजती है।
नयी ऊर्जा संचरित करती है।
जीवन के नए आयाम ढूँढती है।
समय सहारा देता है
और ढाँढस भी.....
फिर से उठकर सँभलने का
और फिर से प्रारब्ध होता है नए युग का।





About author
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डॉ. मंजू थापा

स्वतंत्र रचनाकार,कई पत्र पत्रिकाओं में लेख और कविताएं प्रकाशित। निरंतर रचनात्मक लेखन की राह में समर्पित।। 

ब्लाॅग का उद्देश्य रचनात्मक चिंतन एवं मनोभावों को नई दिशा एवं प्रेरणा मिले,जिससे लेखन प्रभावी और सारगर्भित हो।।