करता है उन्मुक्त हास मन, मेरी श्रद्धा ही मेरी आस।। बनकर जीवन एक मृदु पवन, दे जाये मधु आभास।।मेरा आस -पुंज प्रज्वलित, बनकर तम का दृढ़ सहारा।। यह तो प्रेरणा जीवन की, है जीवन का मधुर किनारा।।

एक बार फिर

एक बार फ़िर, देख लूँ मुड़कर पीछे,
वापस लौटना संभव नहीं हो पायेगा।

एक बार फिर,सुन लूँ वही मधुर तान,
जाने कानों में ये रस कब घुल पायेगा।

एक बार फ़िर, बुन लूँ ख्वाब पुराने से,
टूट गए तो कुछ नया नहीं जुड़ पायेगा।

एक बार फिर,मुस्कुराकर छेड़ दूँ राग ,
नया नहीं सही कुछ पुराना सँवर पायेगा।

एक बार फिर,ढूँढ लूँ यादों का कारंवा,
संग ले चलते रहने से मन सुकून पायेगा।











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डॉ. मंजू थापा

स्वतंत्र रचनाकार,कई पत्र पत्रिकाओं में लेख और कविताएं प्रकाशित। निरंतर रचनात्मक लेखन की राह में समर्पित।। 

ब्लाॅग का उद्देश्य रचनात्मक चिंतन एवं मनोभावों को नई दिशा एवं प्रेरणा मिले,जिससे लेखन प्रभावी और सारगर्भित हो।।