करता है उन्मुक्त हास मन, मेरी श्रद्धा ही मेरी आस।। बनकर जीवन एक मृदु पवन, दे जाये मधु आभास।।मेरा आस -पुंज प्रज्वलित, बनकर तम का दृढ़ सहारा।। यह तो प्रेरणा जीवन की, है जीवन का मधुर किनारा।।

सत्य-असत्य

असत्य के बढ़ते  कदम,

सत्य के दीपक को ढूँढने निकले।
स्वयं तिमिर के गर्त में डूबे,
कहाँ नभ के सूर्य को देखने निकले।
उनींदें नयन,तेज नहीं,नहीं कोई अभिलाषा
आज केवल देखना है,
उसका प्रकाश यही देखने निकले।
कहाँ है उसके नयन सलोने,आकर्षण वाले
हम भी देखते हैं अब,
हम उसका सामीप्य पाने नहीं निकले।
उसकी कीर्ति फैली है दिशाओं,जल थल में
यही नहीं देखना है,
देखना है उसका यश यही देखने निकले।
कितने हृदयों में हो रहा है उसका वास
उसकी कीर्ति का गान,
हम आज मन में ये भाव ले निकले।
अपनी क्रूरमय आँखों से जो टकरा सके
जो तोड़ सके हमें,
उसका यही गर्व देखने निकले।
अभी भी मन नहीं कर रहा पश्चाताप
अभी भी सहना है अपमान
उसी मान के बल उसे ढूँढने निकले।





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डॉ. मंजू थापा

स्वतंत्र रचनाकार,कई पत्र पत्रिकाओं में लेख और कविताएं प्रकाशित। निरंतर रचनात्मक लेखन की राह में समर्पित।। 

ब्लाॅग का उद्देश्य रचनात्मक चिंतन एवं मनोभावों को नई दिशा एवं प्रेरणा मिले,जिससे लेखन प्रभावी और सारगर्भित हो।।