करता है उन्मुक्त हास मन, मेरी श्रद्धा ही मेरी आस।। बनकर जीवन एक मृदु पवन, दे जाये मधु आभास।।मेरा आस -पुंज प्रज्वलित, बनकर तम का दृढ़ सहारा।। यह तो प्रेरणा जीवन की, है जीवन का मधुर किनारा।।

यूँ हीं

यूँ ही ना बीते ये दिन।।


शीतल नदी के शांत किनारे,
समीर की हल्की आहट के सहारे 
उड़ जाते बिना क्षण गिन।।

कचनार खिलता जहाँ पर भी,
दिखता बसंत उस पार सभी
सूना बाकी उसके बिन।।

निश्छल ठहरते जहाँ विचार,
सुध बुध बिसराये कहाँ पार, 
उम्मीद जागती,जाती छिन।।

यूँ ही ना बीते ये दिन





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डॉ. मंजू थापा

स्वतंत्र रचनाकार,कई पत्र पत्रिकाओं में लेख और कविताएं प्रकाशित। निरंतर रचनात्मक लेखन की राह में समर्पित।। 

ब्लाॅग का उद्देश्य रचनात्मक चिंतन एवं मनोभावों को नई दिशा एवं प्रेरणा मिले,जिससे लेखन प्रभावी और सारगर्भित हो।।