करता है उन्मुक्त हास मन, मेरी श्रद्धा ही मेरी आस।। बनकर जीवन एक मृदु पवन, दे जाये मधु आभास।।मेरा आस -पुंज प्रज्वलित, बनकर तम का दृढ़ सहारा।। यह तो प्रेरणा जीवन की, है जीवन का मधुर किनारा।।

शब्द

शब्द.......

उथले नहीं होते।
उजले होते है।
कर देते हैं आसानी से चरित्र का बखान।
चाहे कितना इनको चाशनी में लपेट कर परोसो।खोल देते है कलई मन की तह की
और इंसान ये सोचता है
कि कई रहस्य मैंने छुपा लिए।
सामने वाला जान ही नहीं सका
लेकिन इस छुपने छुपाने की कला को परखने के भीतर .....
वो भूल जाता है...
कि क्या कभी प्राचीन अर्वाचीन से भिन्न हो सकता है?
बस स्वरुप का अन्तर होता है
बाकी सब वैसा ही रहता है
और वह स्वयं को महान समझता हुआ,
जाने क्यों और किस पर हँसता है?







About author
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डॉ. मंजू थापा

स्वतंत्र रचनाकार,कई पत्र पत्रिकाओं में लेख और कविताएं प्रकाशित। निरंतर रचनात्मक लेखन की राह में समर्पित।। 

ब्लाॅग का उद्देश्य रचनात्मक चिंतन एवं मनोभावों को नई दिशा एवं प्रेरणा मिले,जिससे लेखन प्रभावी और सारगर्भित हो।।