करता है उन्मुक्त हास मन, मेरी श्रद्धा ही मेरी आस।। बनकर जीवन एक मृदु पवन, दे जाये मधु आभास।।मेरा आस -पुंज प्रज्वलित, बनकर तम का दृढ़ सहारा।। यह तो प्रेरणा जीवन की, है जीवन का मधुर किनारा।।

फिर एक बार.....

फिर एक बार मैं ढूँढ रहा हूँ अपनी पराजय।।

विश्वास था ख़ुद पर कर लूँगा सामना 
आते जाते हर एक वार का।
अहम् के आगे झुकना नहीं था,
अचूक था लक्ष्य मेरे हथियार का।
चला गया हूँ निश्चिन्त बनकर अभय।
फिर एक बार मैं ढूँढ रहा हूँ अपनी पराजय।।

बेला बीत गयी दिन की अब ,
निशा झिलमिलाती नहीं आएगी ।
जितना सोचूं उतना भार ये,
स्पंदित गति नहीं  सह पायेगी ।
अपने को पाने को करना होगा उपाय।
फिर एक बार मैं ढूँढ रहा हूँ अपनी पराजय।।

समझ नहीं पाता हूँ कहाँ हुई भूल,
जो चलता गया बिन सोचे समझे।
आए कई मंथन राह रोकने पर,
बढ़ता गया अनदेखा कर बिन बूझे।
कैसे इस मुश्किल पल में मिलेगी जय।
फिर एक बार मैं ढूँढ रहा हूँ अपनी पराजय।।










About author
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डॉ. मंजू थापा

स्वतंत्र रचनाकार,कई पत्र पत्रिकाओं में लेख और कविताएं प्रकाशित। निरंतर रचनात्मक लेखन की राह में समर्पित।। 

ब्लाॅग का उद्देश्य रचनात्मक चिंतन एवं मनोभावों को नई दिशा एवं प्रेरणा मिले,जिससे लेखन प्रभावी और सारगर्भित हो।।