करता है उन्मुक्त हास मन, मेरी श्रद्धा ही मेरी आस।। बनकर जीवन एक मृदु पवन, दे जाये मधु आभास।।मेरा आस -पुंज प्रज्वलित, बनकर तम का दृढ़ सहारा।। यह तो प्रेरणा जीवन की, है जीवन का मधुर किनारा।।

बस अब जाना है मुझे

बस अब जाना है मुझे।।

रुक गया बहुत बातें करने
कुछ सुने अनसुने किस्से गढ़ने।
चाशनी सी मीठी चाय की ले चुस्कियां
साथ में तीखी चटनी संग पकोड़ियां।
इनको भी पचाना है मुझे।
बस अब जाना है मुझे।।

उधार लिया साथ जब तक का
भर कर जा रहा हूँ किराया उसका।
मीठे खट्टे ताने रखूँगा याद जीवन भर
मुझे यादों से न बिसराना तुम भूलकर।
साथ ऐसे ही निभाना है मुझे।
बस अब जाना है मुझे ।।

सुख जो सुखाये साथ मिलकर
उलझे दुःख सुलझाए घुलकर।
शाम की बैठक का मनोहर निमंत्रण
स्वीकार किया मौन बनकर आमंत्रण।
यही ताना बाना बनाना है मुझे।
बस अब जाना है मुझे ।।

क्षणिक दुःख होगा मन के भीतर
इससे निकला जा सकता है पल भर।
व्यस्त रहना है घड़ी की टिक टिक सा
रुकना नहीं चलते रहना बन एक सा।
यही तुम मुझमें अपनाना है मुझे।
बस अब जाना है मुझे।।












About author
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डॉ. मंजू थापा

स्वतंत्र रचनाकार,कई पत्र पत्रिकाओं में लेख और कविताएं प्रकाशित। निरंतर रचनात्मक लेखन की राह में समर्पित।। 

ब्लाॅग का उद्देश्य रचनात्मक चिंतन एवं मनोभावों को नई दिशा एवं प्रेरणा मिले,जिससे लेखन प्रभावी और सारगर्भित हो।।