करता है उन्मुक्त हास मन, मेरी श्रद्धा ही मेरी आस।। बनकर जीवन एक मृदु पवन, दे जाये मधु आभास।।मेरा आस -पुंज प्रज्वलित, बनकर तम का दृढ़ सहारा।। यह तो प्रेरणा जीवन की, है जीवन का मधुर किनारा।।

पलायन कर ना सकूँगा मैं

पलायन कर ना सकूँगा मैं।।

शून्य क्षितिज़ के आँगन से।

नीलाभ रजत के प्रांगण से।

श्याम मेघ की सौदामिनी से।

वर्षा की मृदु कामिनी से।

पलायन कर ना सकूँगा मैं।।

जीवन के हर उत्सव से।

बसंत के खिले पल्लव नव से।

लहरों के उठ गिर परिमाणों से।

शलभ के समर्पित प्राणों से।

पलायन कर ना सकूँगा मैं।।




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