करता है उन्मुक्त हास मन, मेरी श्रद्धा ही मेरी आस।। बनकर जीवन एक मृदु पवन, दे जाये मधु आभास।।मेरा आस -पुंज प्रज्वलित, बनकर तम का दृढ़ सहारा।। यह तो प्रेरणा जीवन की, है जीवन का मधुर किनारा।।

चलता हूँ मैं नित नई भोर

चलता हूँ मैं नित नई भोर।।


पलछिन बीते दिन को देता आभार,
स्मृति  में  रखकर  चलता  बारंबार,
पकड़े हुए इसका हर छोर।
चलता हूँ मैं नित नई भोर।।

तुम और मैं के अहम् से  जागकर,
बीती रात के दुःस्वपन से भागकर,
मिला आशा की दिशा की ओर।
चलता हूँ मैं नित नई भोर।।

कुंठित होने का समय पर्याप्त हुआ,
इच्छा मन की  जो वही प्राप्त हुआ,
उमड़े आँसू मन के घनघोर।
चलता हूँ मैं नित नई  भोर।।





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डॉ. मंजू थापा

स्वतंत्र रचनाकार,कई पत्र पत्रिकाओं में लेख और कविताएं प्रकाशित। निरंतर रचनात्मक लेखन की राह में समर्पित।। 

ब्लाॅग का उद्देश्य रचनात्मक चिंतन एवं मनोभावों को नई दिशा एवं प्रेरणा मिले,जिससे लेखन प्रभावी और सारगर्भित हो।।