करता है उन्मुक्त हास मन, मेरी श्रद्धा ही मेरी आस।। बनकर जीवन एक मृदु पवन, दे जाये मधु आभास।।मेरा आस -पुंज प्रज्वलित, बनकर तम का दृढ़ सहारा।। यह तो प्रेरणा जीवन की, है जीवन का मधुर किनारा।।

कर्ण

कर्ण....

हाँ,मैं वही हूँ जो सुना आपने अकस्मात
पर याद आयी कैसे?
इतने दुर्लभ दिन बीते।
कुछ समतल कुछ रीते।
पर उनमें भी थी कुछ कष्ट की छाँव।
कुछ में सिहरते घाव।
मुझे स्वयं ही जूझना पड़ा।
अपना संबल आप ही बना।
तब आत्मबोध नहीं हुआ?
स्मृति करो...उस क्षण की
जब श्रेष्ठतम प्रदर्शन करने के बाद भी,
मुझे रणभूमि में आहत होना पड़ा था।
कारण जानती हैं ना?
तब उस भीड़ में
क्यों नहीं स्वीकार किया?
पुत्र रूप में।
उस समय क्यों एक साम्राज्ञी 
माँ नहीं बन सकी?
क्यों चुप थी?
क्या राजधर्म पुत्रस्नेह से बढ़कर था?
स्वेद से पूर्ण वाह्य तन
और गरल पीता असहाय मन।
उसी आक्रोश और अवहेलना में,
मुझे अपनाया दुर्योधन ने
मित्र ! विपत्ति में साथ देने वाला
पर उसके पश्चात भी
संघर्ष करता रहा अपार
जीवन के हर क्षण में
मेरा जन्म मात्र उपेक्षा के लिए था
आज भी है
और शायद रहेगा अनंतर
फिर भी एक साम्राज्ञी कुछ अपेक्षा रखती है
जिसके पास सब है
सत्ता,शक्ति,वैभव और....पांच पुत्र
आपको कुछ देने का सामर्थ्य सूतपुत्र में नहीं
मैं आपके समक्ष कुछ नहीं
फिर भी
मेरा जो भी मेरा है
आप उससे कुछ भी आदेश करें
मैं प्रस्तुत हूँ
एक साम्राज्ञी को अपना तन,मन और पूर्ण जीवन
समर्पित करूँ
धन्य होऊंगा मैं
प्रस्तुत है कर्ण स्वयं के दान के लिए
आदेश करे.......।

 





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डॉ. मंजू थापा

स्वतंत्र रचनाकार,कई पत्र पत्रिकाओं में लेख और कविताएं प्रकाशित। निरंतर रचनात्मक लेखन की राह में समर्पित।। 

ब्लाॅग का उद्देश्य रचनात्मक चिंतन एवं मनोभावों को नई दिशा एवं प्रेरणा मिले,जिससे लेखन प्रभावी और सारगर्भित हो।।