करता है उन्मुक्त हास मन, मेरी श्रद्धा ही मेरी आस।। बनकर जीवन एक मृदु पवन, दे जाये मधु आभास।।मेरा आस -पुंज प्रज्वलित, बनकर तम का दृढ़ सहारा।। यह तो प्रेरणा जीवन की, है जीवन का मधुर किनारा।।

झंझावत

कही मिलता नहीं किनारा,

चक्रवातों में घिरकर।।

ढूंढ भी नहीं रहे सहारा,

संसार में फिरकर।।

सफल हो रही जटिलताएं,

संकट को यूँही पाकर।।

जैसे छीन रहा कोई भविष्य,

भाग्य को उकसाकर।।

धीरज का गहरा मापदंड,

टूट रहा बिखरकर।।

समझ रहा इस खेल को,

धोखे में पड़कर।।

हो रहा प्रवाहमान मन,

भावुकता में बहकर।।

समझ नहीं रहा प्रश्न समय के,

आवेगों निश्चय बनकर।।




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