करता है उन्मुक्त हास मन, मेरी श्रद्धा ही मेरी आस।। बनकर जीवन एक मृदु पवन, दे जाये मधु आभास।।मेरा आस -पुंज प्रज्वलित, बनकर तम का दृढ़ सहारा।। यह तो प्रेरणा जीवन की, है जीवन का मधुर किनारा।।

धीर

धरता क्यों नहीं ये धीर, 

छुपाता है मन कोई पीर।। 

सजल हुए नेत्रों के कोर, 
उलझन से सने पोर पोर।। 

बिखरी जीवन की कड़ी, 
मिलती ना शांति इक घड़ी।। 

द्वंद्व हराता अपने आप से, 
निरीह देखता चुपचाप से।। 

विवश हूँ कहूँ किस से बात, 
समझे सुबह को कैसे रात।। 

वेदना करे हलचल भीतर, 
डुबो रही वाह्य व अंतर।। 





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डॉ. मंजू थापा

स्वतंत्र रचनाकार,कई पत्र पत्रिकाओं में लेख और कविताएं प्रकाशित। निरंतर रचनात्मक लेखन की राह में समर्पित।। 

ब्लाॅग का उद्देश्य रचनात्मक चिंतन एवं मनोभावों को नई दिशा एवं प्रेरणा मिले,जिससे लेखन प्रभावी और सारगर्भित हो।।