करता है उन्मुक्त हास मन, मेरी श्रद्धा ही मेरी आस।। बनकर जीवन एक मृदु पवन, दे जाये मधु आभास।।मेरा आस -पुंज प्रज्वलित, बनकर तम का दृढ़ सहारा।। यह तो प्रेरणा जीवन की, है जीवन का मधुर किनारा।।

कैसा बचपन

कैसा बचपन,जो तंग गलियों में

सिसकता सा गुज़रता है।
कैसा बचपन,जो कई प्रहर
खाने को तरसता है।
कैसा बचपन,जिस पर
झिड़की का व्यवहार बरसता है
कैसा बचपन,खिलखिलाता नहीं,
आँसू की धार धरता है।
कैसा बचपन, कुछ रुपयों पर
अपना अस्तित्व रखता है।
कैसा बचपन,जो नित मरकर
जीने की आशा करता है।
कैसा बचपन,जो धूप छाँव
के अंतर में नहीं सिमटता है।
कैसा बचपन,जो बिना प्रीत के
दिन रैन सा चलता फिरता है।
कैसा बचपन, जो दूर दूर तक
नरक की आग में जलता है।
कैसा बचपन,जो अभाव के
कारण कभी नहीं संवरता है।





About author
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डॉ. मंजू थापा

स्वतंत्र रचनाकार,कई पत्र पत्रिकाओं में लेख और कविताएं प्रकाशित। निरंतर रचनात्मक लेखन की राह में समर्पित।। 

ब्लाॅग का उद्देश्य रचनात्मक चिंतन एवं मनोभावों को नई दिशा एवं प्रेरणा मिले,जिससे लेखन प्रभावी और सारगर्भित हो।।